Shajapur भारत के मध्य प्रदेश राज्य के शाजापुर ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िला मुमुख्यालय भी है। यह राज्य के मालवा क्षेत्र में स्थित है। शाजापुर नगर अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए ख्यात है। जिला 10वीं व 12वीं शताब्दी के परमार काल से लेकर मुगलकाल, मराठा वंश के लिए महत्वपूर्ण रहा है। कभी खांखराखेड़ी के नाम से प्रसिद्ध रहा शाजापुर से बाज बहादुर से लेकर शाहजहां तक का लगाव रहा है। विशेष यह है कि जिले से निकली चीलर, कालीसिंध, पार्वती नदी के आसपास जो छोटी-छोटी बसाहटें हुई वह अब विभिन्न नगरों का रूप ले चुकी हैं। जिले के कई नगर अपने गौरवशाली इतिहास के लिए जाने जाते हैं।
अवस्थिति (स्थान) :
शाजापुर जिला, क्षेत्रीय चित्रण की वर्तमान योजना के अनुसार केंद्रीय मध्यप्रदेश पठार-रतलाम पठार माइक्रो क्षेत्र का एक हिस्सा है। जिला राज्य के उत्तर पश्चिमी भाग में स्थित है तथा अक्षांश 23″06′ और 24″19′ उत्तर तथा देशांतर 75″41′ और 77″02′ पूर्व के बीच स्थित है। जिला पश्चिम में उज्जैन और आगर-मालवा, दक्षिण में देवास और सीहोर, उत्तर में राजगढ़ तथा पूर्व में सीहोर जिले से घिरा है। उज्जैन संभाग में शाजापुर जिला 1981 की जनगणना के दौरान लाया गया था। जिला मुख्यालय के शहर शाजापुर के नाम से पहचाना जाता है, जिसका नाम मुगल सम्राट शाहजहां के सम्मान मे रखा गया जो 1640 में यहां रुके थे। यह कहा जाता है कि मूल नाम शाहजहांपुर था, जो बाद में छोटा कर शाजापुर कर दिया गया। ग्वालियर राज्य के गठन के बाद से, यह एक जिला बना हुआ है।
भौतिक विशेषताऐं:
पूरा जिला क्रेटेशियस युगीन डेक्कन ट्रैप का एक हिस्सा है। जिल में गहरे काले और उथले काले भूरे और उत्तरी क्षेत्र के जलोढ़ मिट्टी है। जिले की भौतिक-सांस्कृतिक विविधता ईसे निम्नलिखित उप-सूक्ष्म क्षेत्रों में उप-विभाजित करती है: शाजापुर वन अपलैंड(Upland), कालीसिंध-बेसिन,शाजापुर-अपलैंड(Upland)।
शाजापुर फॉरेस्ट अपलैंड:
क्षेत्र जिले के मध्य में उत्तर से दक्षिण तक फैला हुआ है जो आगर और शाजापुर तहसील के काफी हिस्से और सुसनेर तहसील के छोटे हिस्से को कवर करता है। यह विशिष्ट स्थलाकृति के साथ मालवा पठार का एक हिस्सा है। पूरे क्षेत्र में पहाड़ियों का सिलसिला जारी है। इस क्षेत्र की ऊंचाई औसत समुद्र तल से 450 और 530 मीटर के बीच भिन्न होती है। सतह की ऊंचाई उत्तर की ओर कम हो जाती है। चूंकि यह एक ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र है, इस क्षेत्र से कई मौसमी धाराएँ निकलती हैं और ज्यादातर पूर्व की ओर बहती हैं। लकुंदर और आहु इस क्षेत्र में दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली मुख्य धाराएँ हैं। धाराएँ, जो इसके बाएं किनारे पर लकुंदर नदि में मिलती हैं, इस पहाड़ी मार्ग से निकलती हैं। आहू नदी क्षेत्र की पश्चिमी सीमा के साथ बहती है। पहाड़ी इलाके जंगलों से आच्छादित हैं।
काली सिंध बेसिन:
यह क्षेत्र जिले की दक्षिणी और उत्तरी सीमा के बीच विस्तृत है। यह सुसनेर और शाजापुर तहसील के प्रमुख हिस्सों और आगर तहसील के एक बहुत छोटे हिस्से पर कब्जा कर लेता है। इस क्षेत्र का दक्षिणी भाग पहाड़ी है जबकि उत्तरी भाग में समतल भूमि की विशेषताएं हैं। पहाड़ियाँ धीरे-धीरे दक्षिण से उत्तर की ओर ऊँचाई में घटती जाती हैं। मध्य और उत्तरी भागों में भी कुछ बिखरी हुई पहाड़ियाँ हैं। इस क्षेत्र की ऊँचाई औसत समुद्र तल से 450 और 528 मीटर के बीच बदलती है। कई धाराएं पहाड़ी क्षेत्र का निर्माण करती हैं और सतह को विच्छेदित करती हैं। काली सिंध मुख्य नदी है, जो पहाड़ियों से गुजरती है और आगे जिले की पूर्वी सीमा पर बहती है। लकुंदर काली सिंध का मुख्य नाला है जो उत्तर की ओर बहती है। भूवैज्ञानिक रूप से पूरा क्षेत्र क्रिएकेनियस ईओसीन अवधि के डेक्कन ट्रैप का एक हिस्सा है।
शाजापुर अपलैंड:
यह क्षेत्र पूरे शुजालपुर तहसील और शाजापुर तहसील के एक छोटे खंड को कवर करते हुए जिले के पूर्वी हिस्से में फैला हुआ है। मालवा पठार का एक हिस्सा होने के नाते, यह विच्छेदित स्थलाकृति प्रस्तुत करता है। एक पहाड़ी श्रृंखला उत्तर से इस क्षेत्र में प्रवेश करती है और दक्षिण की ओर बढ़ती है। इस क्षेत्र का दक्षिणी भाग एक ऊबड़ खाबड़ क्षेत्र है और उत्तरी भाग अपेक्षाकृत नीचा है। दक्षिण में पहाड़ियां बिखरी हुई है और विभिन्न धाराओं द्वारा मिटा दिया जाता है। इस क्षेत्र की ऊंचाई मुख्य समुद्र तल से 435 और 507 मीटर के बीच है। 450 मीटर समोच्च नेवज नदी के साथ उस क्षेत्र को घेरता है जहां छोटी-छोटी पहाड़ियां फैली हुई हैं। नेवज नदी इन पहाड़ियों को काटती है। क्षेत्र का पूर्वी भाग एक नीची है और पश्चिमी भाग की जल विभाजन रेखा का निर्धारण नेवज की सहायक नदियों द्वारा किया जा सकता है। नेवज नदी और पारबती नदी इस क्षेत्र से बहती हैं। पारबती नदी उत्तर की ओर पूर्वी क्षेत्र में बहती है जबकि नेवज नदी क्षेत्र के बीच में बहती है। दोनों ही नदियां बारहमासी हैं।
दिल्ली पैटर्न पर बनवाए दरवाजे
क्षेत्र में कभी इतने पलाश खांखरा के पेड़ हुआ करते थे कि इसका नाम ही खांखराखेड़ी पड़ गया। पलाश के वृक्षों से ढंका व आसपास पहाड़ियों के होने से क्षेत्र सौंदर्य से सराबोर था। कहा जाता है कि मुगल बादशाह शाहजहां को यह क्षेत्र बहुत पसंद आया। सितंबर 1640 में मीर बिगो को यहां का कोतवाल नियुक्त कि या गया। जगन्नाथ रावल के साथ मिलकर उन्होंने इस क्षेत्र को दिल्ली पैटर्न पर तैयार करने की योजना बनाई। परिणाम स्वरुप यहां पर चार बड़े दरवाजे बनवाए गए। इनके मध्य में बाजार स्थापित कि या गया। परिणामस्वरूप क्षेत्र तेजी से आबाद हुआ।
शाहजहां के नाम पर नाम पड़ा शाहजहांपुर
बादशाह शाहजहां के नाम पर इसका नाम शाहजहांपुर रखा गया, जो बाद में समय के साथ शाजापुर हो गया। कहा जाता है कि जब शाहजहां का उज्जैन की ओर जाना हुआ तो उन्होंने यहां एक रात विश्राम कि या था। बादशाह को यह जगह इतनी पसंद आई कि यहां किले का निर्माण भी करवाया। शहर के मध्य बना शाहजहांकालीन किला आज भी मौजूद है। करीब 400 साल से पुरानी यह धरोहर मुगलकाल में बनी थी। सबसे अहम बात यह है कि इस दुर्ग की सुरक्षा के लिए चीलर नदी का प्रवाह मोड़ा गया था। पहले सोमवारिया बाजार से होकर बहने वाली नदी को महूपुरा क्षेत्र से होते हुए कि ले से लेकर बादशाही पुल तक ले जाया गया। मुगलों के पतन के बाद यहां 1707 के पश्चात यह क्षेत्र मराठों के स्वमित्व में आया। शाजापुर 1732 में ग्वालियर के सिंधिया वंश के अधिकार में आ गया। वह 28 मई 1948 तक निरंतर बना रहा।
प्राचीन मां राजराजेश्वरी मंदिर
एबी रोड स्थित मां राजराजेश्वरी देवी मंदिर लाखों भक्तों की आस्था का कें द्र बिंदू रहा है। मां की मूर्ति अति प्राचीन है। मंदिर का निर्माण राजा भोज के काल में 1018 से 1060 के बीच हुआ था। मां के दरबार से कई तरह के चमत्कार जुड़े हुए हैं। जिले सहित अन्य शहरों के भक्त भी यहां पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान भक्तों का हुजूम उमड़ता है। मां राजराजेश्वरी मंदिर में करीब 50 साल से अखंड ज्योत जल रही है।
सुंदरसी का महाकाल मंदिर तो पोलायकलां का सूर्य कुंड
शाजापुर जिले का गौरवशाली इतिहास रहा है। धरोहरों को लेकर हो या स्वतंत्रता आंदोलन हर क्षेत्र में शाजापुर विख्यात रहा है। जिले के आसपास परमारकालीन 10वीं एवं 12वीं शताब्दी के अनेक परमारकालीन अवशेष बिखरे पड़े हुए हैं, जो जिले की बसाहट की प्राचीनता को दर्शाते हैं। ग्राम सुंदरसी का महाकाल मंदिर अपने आप में अद्भुत है। उज्जैन के महाकाल मंदिर की तर्ज पर बना यह मंदिर स्थापत्य कला का नमूना प्रस्तुत करता है। इसी तरह जामनेर का जैन मंदिर व पोलायकलां का सूर्य कुंड से भी जुडी अनेक किं वदंतिया हैं। नांदनी, चांदनी, अवंतिपुर बडोदयिा, झररनेश्वर महादेव मक्सी प्रसिद्ध स्थल है। वहीं तिंगजपुर भी ऐतिहासिक रहा है। यहां से बाज बहादुर का उज्जैन जाने के समय निकलना होता था। शाजापुर का सोमेश्वर महादेव मंदिर भी प्राचीन शिव मंदिर है। फू टा देवल के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर कभी चीलर नदी के कि नारे बसा हुआ था। 1640 में नगर बसाहट के दौरान नदी का प्रवाह मोड़ दिया गया था। इसी तरह चीलर नदी के कि नारे बना महादेव घाट भी प्राचाीन घाट है। यहां ताराबाई की स्मृति में बनी छतरी का निर्माण सिंधिया देव ट्रस्ट द्वारा कि या गया था, लेकि न समय के साथ यह जर्जर होकर अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। डॉ. भावसार बताते हैं कि शाजापुर नगर बसाने में मगरिया, महूपुरा, डांसी, मुरादपुरा, वजीरपुरा, कमरदीपुरा, दायरा, लालपुरा, मुगलपुरा, गोल्याखेड़ी, जुगनवाड़ी, मीरकलां इस प्रकार बाहरपुर बनाए गए थे। जिनमें शाहजहां के बेटे मुराद के नाम पर मुरादपुरा एवं मीरकलां का नाम मीर बीगो ने अपने स्वयं के नाम पर किया था।